एक अनुरोध… जो मेरे लिए अवसर बन गया
Think and Grow Rich Academy से जुड़ने के बाद मेरे जीवन में सीखने का एक नया अध्याय शुरू हुआ।
वहाँ सीखने की पद्धति मेरे लिए बिल्कुल नई थी।
हम Think and Grow Rich पुस्तक को केवल पढ़कर आगे नहीं बढ़ जाते थे। पुस्तक के एक अध्याय को लगभग बीस-इक्कीस दिनों तक लगातार पढ़ते, उस पर चर्चा करते और फिर उसके विचारों को अपने जीवन से जोड़कर देखते थे।
इससे पहले मैंने पुस्तकें पढ़ी थीं, लेकिन किसी एक विचार के साथ इतने दिनों तक रहना और उसे धीरे-धीरे अपने भीतर उतरते हुए देखना—यह मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था।
शायद यहीं से पुस्तकों के साथ मेरे संबंध में एक बड़ा परिवर्तन शुरू हुआ।
मुझे पहली बार समझ में आने लगा कि—
“पुस्तक को समाप्त कर देना और पुस्तक को अपने जीवन में उतार लेना—दो अलग बातें हैं।”
लेकिन मेरे सामने एक कठिनाई थी।
Academy में अधिकांश साथी Think and Grow Rich के chapters अंग्रेजी में पढ़ते थे। मेरी अंग्रेजी इतनी अच्छी नहीं थी कि मैं पुस्तक के विचारों से उस गहराई से जुड़ पाता, जिस गहराई से जुड़ना चाहता था।
एक दिन मैंने रवि सर से कहा—
“सर, मैं इस पुस्तक को हिंदी में पढ़ना चाहता हूँ। हिंदी में पढ़ूँगा तो शायद इसके विचारों को अधिक गहराई से समझ पाऊँगा।”
मुझे लगा था कि वे मुझे हिंदी में पढ़ने की अनुमति दे देंगे और बात वहीं समाप्त हो जाएगी।
लेकिन जीवन में कई बार हमारे छोटे-से अनुरोध का उत्तर एक नए अवसर के रूप में आता है।
रवि सर ने कहा—
“चलिए मधुकर जी, हिंदी में पढ़ने वाले कुछ और साथियों का एक WhatsApp Group बना देते हैं।”
मैं खुश हुआ।
लगा, समस्या का समाधान हो गया।
लेकिन उनकी अगली बात ने कहानी बदल दी।
उन्होंने कहा—
“और इस Group को आप Lead कीजिए।”
मैंने इसकी कल्पना नहीं की थी।
मैं तो केवल हिंदी में पुस्तक पढ़ना चाहता था।
यहाँ तो मेरे गले में एक नई जिम्मेदारी आ गई थी।
हमारी भाषा में कहें तो—
“राम-राम करते गले पड़ गई।”
मन पूरी तरह तैयार नहीं था। झिझक भी थी कि मैं स्वयं सीख रहा हूँ, तो दूसरों को साथ लेकर कैसे चलूँगा?
लेकिन शायद अवसर हमेशा बड़े अक्षरों में OPPORTUNITY लिखकर नहीं आते।
कभी वे जिम्मेदारी बनकर आते हैं।
और उस समय हमारे पास दो रास्ते होते हैं—
पीछे हट जाएँ।
या फिर कहें—
“मैं कोशिश करूँगा।”
मैंने वह चुनौती स्वीकार कर ली।
शायद भारी मन से।
शायद पूरी तैयारी के बिना।
लेकिन स्वीकार कर ली।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि जीवन के कुछ महत्वपूर्ण मोड़ बहुत बड़े निर्णययों से नहीं, ऐसी ही छोटी-सी “हाँ” से शुरू होते हैं।
Book Reading Club-5 — जो एक Learning School बन गया
उस WhatsApp Group का नाम था—
Book Reading Club-5, यानी BRC-5।
अब मेरी सुबह बदल गई थी।
प्रतिदिन लगभग साढ़े छह बजे उठना, Group में reading link भेजना, साथियों को जोड़ना, discussion को active रखना और Group को नियमित रूप से संचालित करना—धीरे-धीरे मेरी जिम्मेदारी बन गई।
शुरुआत में यह एक अतिरिक्त काम लगता था।
लेकिन कुछ समय बाद वही जिम्मेदारी मेरे जीवन की एक महत्वपूर्ण पाठशाला बन गई।
क्योंकि BRC-5 में हम केवल पुस्तकें नहीं पढ़ रहे थे।
हम एक-दूसरे से सीख रहे थे।
हमारे Group की सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि हर व्यक्ति अपने साथ कोई न कोई अनुभव, क्षमता और ज्ञान लेकर आया था।
किसी ने PPT बनाना सिखाया।
किसी ने Public Speaking में बेहतर होना सिखाया।
किसी ने Podcast बनाना सिखाया।
किसी ने Communication और Technology में सहायता की।
और किसी ने अपने अनुशासन, नियमितता और उत्साह से पूरे Group को प्रेरित किया।
जिसके पास जो ज्ञान था, उसने उसे अपने तक सीमित नहीं रखा।
हम बाँटते गए।
एक व्यक्ति ने जो सीखा, उसने दूसरे को सिखाया।
किसी को नई skill आती, तो वह बाकी साथियों को भी सिखाता।
किसी को उपयोगी resource मिलता, तो वह पूरे Group तक पहुँचता।
धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि सीखने की सबसे सुंदर व्यवस्था शायद यही होती है—
“जहाँ कोई हमेशा शिक्षक नहीं होता और कोई हमेशा विद्यार्थी नहीं होता।
हर व्यक्ति कभी सीखता है, कभी सिखाता है और कभी किसी दूसरे को आगे बढ़ने में सहायता करता है।”
एक साधारण WhatsApp Group धीरे-धीरे Learning Community और फिर मेरे लिए एक Learning School बन गया।
वहाँ कोई classroom नहीं था।
कोई बड़ी building नहीं थी।
लेकिन सीखने की इच्छा थी, एक-दूसरे को आगे बढ़ाने की भावना थी और अपने ज्ञान को साझा करने का संस्कार था।
आज Read N Rise में “सीखिए और साझा कीजिए” की जो भावना दिखाई देती है, उसके कुछ बीज शायद उन्हीं दिनों में पड़े थे।
इस पूरी यात्रा में मैं अपने Book Reading Club-5 के सभी साथियों के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ।
विशेष रूप से—
रंजना जी, सुरेश कलाल जी, अरविंद जी, ओमप्रकाश जी, शुक्ला जी, राजेंद्र सिंह जी, लक्ष्मण जी पाटिल, किशोर जी काले, धरती भगत जी और पंकज जी सहित उन सभी साथियों का, जिन्होंने अपने समय, अनुभव, ज्ञान और क्षमताओं को खुले मन से साझा किया।
हर व्यक्ति का योगदान अलग था।
लेकिन हर योगदान ने Group को मजबूत बनाया।
हम साथ पढ़ते थे।
साथ चर्चा करते थे।
साथ प्रयोग करते थे।
एक-दूसरे से सीखते थे।
और एक-दूसरे की प्रगति में सहयोग करते थे।
शायद इसी सामूहिक प्रयास का परिणाम था कि हमारा Book Reading Club-5 reading activity में प्रथम स्थान पर पहुँचा।
आज जब मैं उन screenshots को देखता हूँ, तो मुझे केवल एक online meeting दिखाई नहीं देती।
मुझे एक यात्रा दिखाई देती है।
एक व्यक्ति, जो केवल हिंदी में एक पुस्तक पढ़ना चाहता था।
उसने एक छोटा-सा अनुरोध किया।
उसे एक Group की जिम्मेदारी मिली।
उसने पूरी तैयारी न होते हुए भी उस जिम्मेदारी को स्वीकार किया।
कुछ साथी उसके साथ जुड़े।
वे साथ पढ़े।
साथ सीखे।
अपनी-अपनी skills एक-दूसरे के साथ बाँटीं।
और एक दिन उसी छोटे-से Group के प्रयासों को उसके Chief Mentor ने पहचान दी।
मैं रवि सर का हृदय से आभारी हूँ।
क्योंकि मैंने उनसे केवल हिंदी में पढ़ने का अवसर माँगा था—
लेकिन उन्होंने मुझे पढ़ने के साथ-साथ नेतृत्व करने का अवसर दे दिया।
और अपने Chief Mentor श्री सिद्धार्थ शाह सर के प्रति मेरी कृतज्ञता आज भी उतनी ही गहरी है।
उनका उस सुबह हमारी class में आना, हमारा उत्साह बढ़ाना और हमारे प्रयासों को पहचानना मेरे लिए एक ऐसी स्मृति है, जो आज भी मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो इस घटना में मुझे जीवन की एक बड़ी सीख दिखाई देती है—
“अवसर हमेशा हमारी इच्छा के रूप में नहीं आता।
कई बार वह जिम्मेदारी बनकर आता है।”
उस दिन यदि मैंने कहा होता—
“नहीं सर, मैं Group Lead नहीं कर पाऊँगा।”
तो जीवन चलता रहता।
लेकिन मेरे जीवन की एक महत्वपूर्ण learning journey शायद शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाती।
इसलिए आज अपने अनुभव से मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा—
“जब जीवन आपको सीखने, नेतृत्व करने या किसी नई जिम्मेदारी को स्वीकार करने का अवसर दे, तो केवल यह मत पूछिए—क्या मैं इसके लिए तैयार हूँ?”
कभी-कभी स्वयं से यह भी पूछिए—
“क्या यह अवसर मुझे उस व्यक्ति में बदल सकता है, जो मैं अभी नहीं हूँ?”
क्योंकि BRC-5 ने मुझे केवल पुस्तकें पढ़ना नहीं सिखाया।
वहाँ नियमित पढ़ने का अनुशासन बना।
सीखते हुए सिखाने की आदत विकसित हुई।
Public Speaking, Presentation, Podcasting, Communication और Technology जैसी नई skills से परिचय हुआ।
लोगों को साथ लेकर चलने का अभ्यास मिला।
और सबसे महत्वपूर्ण—
ज्ञान को अपने तक सीमित रखने के बजाय उसे साझा करने की भावना मजबूत हुई।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ में आता है कि उस दिन की एक छोटी-सी “हाँ” केवल BRC-5 का Group Leader बनने तक सीमित नहीं रही।
वही “हाँ” मेरे लिए आगे आने वाले अनेक अवसरों का द्वार बन गई।
धीरे-धीरे Think and Grow Rich Academy में मुझे और जिम्मेदारियाँ मिलने लगीं।
सीखने के साथ-साथ जो कुछ सीखा, उसे दूसरों के साथ बाँटने के अवसर मिलने लगे।
आगे चलकर Master Student के रूप में Academy के भीतर मुझे अनेक sessions, discussions और learning activities में सक्रिय रूप से योगदान देने का अवसर मिला।
कभी किसी विषय को समझाना था।
कभी अपने अनुभव साझा करने थे।
कभी किसी साथी को आगे बढ़ने में सहायता करनी थी।
और कभी स्वयं सामने खड़े होकर दूसरों के साथ वह ज्ञान बाँटना था, जिसे कुछ समय पहले तक मैं स्वयं सीख रहा था।
यह मेरे जीवन की एक और महत्वपूर्ण learning थी—
“ज्ञान को बाँटने से पहले पूर्ण होना आवश्यक नहीं है।
ईमानदारी से सीखते रहना और जो उपयोगी सीखा है, उसे दूसरों तक पहुँचाते रहना भी विकास की एक सुंदर यात्रा है।”
मैं जितना सिखाता गया, उतना ही स्वयं सीखता गया।
जितना साझा करता गया, उतनी ही मेरी समझ गहरी होती गई।
धीरे-धीरे Public Speaking का आत्मविश्वास बढ़ा।
Communication बेहतर हुआ।
Presentation देने की क्षमता विकसित हुई।
लोगों के सामने अपने विचारों को सरल रूप में रखने का अभ्यास मिला।
और शायद सबसे महत्वपूर्ण—
मेरे भीतर यह विश्वास मजबूत हुआ कि सीखने का सर्वोत्तम उपयोग केवल स्वयं आगे बढ़ना नहीं, बल्कि दूसरों को भी आगे बढ़ने में सहायता करना है।
आज मैं स्पष्ट रूप से देख सकता हूँ कि—
एक छोटी-सी “हाँ” ने मुझे Group Leader बनाया।
Group Leader की जिम्मेदारी ने मुझे अनुशासन सिखाया।
साथियों ने मुझे नई skills सिखाईं।
सीखते हुए सिखाने ने मेरी समझ को गहरा किया।
और Academy में Master Student के रूप में मिले अवसरों ने मुझे यह अनुभव कराया कि—
“जो ज्ञान जीवन में उपयोगी है, उसे सरल बनाकर दूसरों तक पहुँचाना भी एक सेवा है।”
शायद उस समय मुझे पता नहीं था।
लेकिन Read N Rise की दिशा में मेरी यात्रा का यह एक महत्वपूर्ण कदम था।
आज Read N Rise को देखते हुए मुझे यह connection और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
जो व्यक्ति केवल हिंदी में एक पुस्तक पढ़ना चाहता था—
उसे एक Group मिला।
Group ने उसे जिम्मेदारी दी।
जिम्मेदारी ने अनुशासन दिया।
साथियों ने नई skills दीं।
सिखाने ने सीखने को गहरा किया।
Academy ने सीखने के साथ-साथ ज्ञान बाँटने के अवसर दिए।
और sharing ने भीतर एक नया विचार पैदा किया—
“यदि सीखने से मेरा जीवन बेहतर हो सकता है, तो क्यों न जो सीखा है उसे सरल रूप में दूसरों तक पहुँचाया जाए?”
शायद उस समय मुझे इसका पता नहीं था।
लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है—
“Read N Rise की शुरुआत किसी एक दिन नहीं हुई थी।”
उसके बीज जीवन की अलग-अलग घटनाओं में बहुत पहले से पड़ रहे थे।
और Book Reading Club-5 उन महत्वपूर्ण स्थानों में से एक था, जहाँ उन बीजों को सीखने, साझा करने और साथ आगे बढ़ने की जमीन मिली।