ये दिल धड़कता है तो बस हिन्दुस्तान कहता है।
अमर शहीदों की इस पावन और पवित्र धरती पर,
जो देश से मोहब्बत करे, वो ही ज़िंदा रहता है!”
मेरे प्यारे देशवासियों और युवाओं, आप सभी को 80वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
आज जब पूरा देश आज़ादी के इस पावन पर्व के जश्न में डूबा है, चारों तरफ तिरंगे लहरा रहे हैं, देशभक्ति के गीत गूंज रहे हैं—तब इस ऊर्जावान माहौल में, मैं आपके सामने एक ऐसा यक्ष प्रश्न लेकर आया हूँ, जो आज के बदलते भारत के लिए सबसे जरूरी है। एक ऐसा सवाल, जिस पर आज सोचना हर उस इंसान के लिए जरूरी है जो इस देश से मोहब्बत करता है।
साथियों, आज देश को आज़ाद हुए एक लंबा अरसा बीत चुका है। लेकिन आज हमें खुद से एक ईमानदार सवाल पूछना होगा—क्या हम वास्तव में आज़ाद हो गए हैं? क्या स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ एक विदेशी हुकूमत को अपने देश से बाहर निकाल देना था? क्या सिर्फ लाल किले पर तिरंगा फहरा देना ही आज़ादी की पूर्णता है?
नहीं! हमारे महापुरुषों के लिए, ‘स्वतंत्रता’ और ‘स्वाधीनता’ का अर्थ बहुत गहरा था। ‘स्व’ का अर्थ है अपना, और ‘तन्त्र’ का अर्थ है व्यवस्था या सोच। स्वाधीनता का मतलब था—अपनी बुद्धि, अपने विचारों और अपने विवेक के अधीन होना। अंग्रेजों ने हमें शारीरिक रूप से गुलाम बनाया था, हमारे संसाधनों पर कब्जा किया था। लेकिन आज, 21वीं सदी के इस डिजिटल दौर में, हम एक नई, अदृश्य और उससे भी कहीं अधिक खतरनाक गुलामी की तरफ बढ़ रहे हैं। वह गुलामी है—वैचारिक गुलामी, यानी आज की “डिजिटल गुलामी” (Digital Slavery)!
कल तक हम अंग्रेजों के गोरे साहबों के गुलाम थे, आज हम विदेशी कंपनियों के कुछ ‘एल्गोरिदम’ और ‘गैजेट्स’ के गुलाम बन चुके हैं। आज हमारा युवा कहाँ भटक रहा है? वह रील्स और शॉर्ट्स की 15 सेकंड की आभासी दुनिया में अपनी सोचने-समझने की शक्ति को गिरवी रख चुका है। जो युवा कभी पुस्तकालयों में बैठकर देश का भविष्य बुनता था, वह आज स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उँगलियाँ घिसकर अपना कीमती समय, अपनी एकाग्रता (Concentration) और अपनी मानसिक चेतना गँवा रहा है। सतही ज्ञान और फेक न्यूज़ के इस दौर में हमारी युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से, अपने गौरवशाली इतिहास से कट रही है। यह वैचारिक भटकाव देश के भविष्य के लिए एक मूक चेतावनी है!
लेकिन मेरे भाइयों और बहनों, यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मोबाइल हमारा दुश्मन नहीं है और न ही टेक्नोलॉजी बुरी है। टेक्नोलॉजी तो महज़ एक माध्यम है, एक साधन है। यह तो एक विशुद्ध ऊर्जा (Energy) है, और ऊर्जा कभी खुद में अच्छी या बुरी नहीं होती। सारा खेल इस बात का है कि उस ऊर्जा का उपयोग कैसे किया जाता है।
इसे एक उदाहरण से समझिए। परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy) भी एक ताकतवर ऊर्जा है। अगर आप उसका गलत इस्तेमाल करेंगे, तो उससे विनाशकारी परमाणु बम बनेगा जो हंसती-खेलती इंसानी बस्तियों को राख कर देगा। लेकिन अगर आप उसी परमाणु ऊर्जा का सही इस्तेमाल करेंगे, तो उससे बिजली बनेगी जो करोड़ों घरों के अंधेरे को दूर कर रोशनी फैलाएगी।
ठीक इसी तरह, आपका स्मार्टफोन भी एक परमाणु ऊर्जा की तरह है। यदि आप इसे सिर्फ 15 सेकंड की रील्स के भटकाव में झोंक देंगे, तो यह आपके भविष्य को तबाह कर देगा। लेकिन अगर आप इसी मोबाइल का उपयोग ज्ञान अर्जित करने, दुनिया की बेहतरीन ई-बुक्स (e-books) पढ़ने, और खुद को विकसित करने के लिए करेंगे, तो यही टेक्नोलॉजी आपके लिए वरदान बन जाएगी। नियंत्रण टेक्नोलॉजी के हाथ में नहीं, नियंत्रण आपके अपने हाथ में होना चाहिए!
गैजेट्स की स्क्रीन आपको सिर्फ एक ‘कंज्यूमर’ (Consumer) बनाती है—दूसरों की सोच को निगलने वाला। जबकि किताबें आपको ‘क्रिएटर’ (Creator) और लीडर बनाती हैं! मोबाइल की स्क्रीन पर जब आप बिना किसी उद्देश्य के स्क्रॉल करते हैं, तो आपकी एकाग्रता खंडित होती है। इसके विपरीत, जब आप हाथ में एक किताब लेकर बैठते हैं और उसे गंभीरता एवं गहराई से पढ़ते हैं, तो वहाँ कोई भटकाव नहीं होता। किताबें आपके भीतर विचारों का ज्वालामुखी पैदा करती हैं।
इतिहास गवाह है कि हथियारों से सिर्फ युद्ध जीते जाते हैं, लेकिन किताबों से पूरी दुनिया जीती जाती है! हमारे देश के जितने भी महान नायक हुए, वे सब के सब बहुत बड़े ‘रीडर’ थे।
स्वामी विवेकानंद जी की एकाग्रता ऐसी थी कि वे पूरी की पूरी किताब कुछ ही घंटों में पढ़ लेते थे और उसका सार आत्मसात कर लेते थे।
शहीद-ए-आजम भगत सिंह को याद कीजिए। जब जल्लाद उन्हें फाँसी के फंदे पर ले जाने आया, तब भी जेल की कोठरी में उनके हाथ में किताब थी। उन्होंने कहा था—“रुकिए, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से बात कर रहा है।” वे मौत से चंद मिनट पहले भी एक ‘रीडर’ थे! क्योंकि वे जानते थे कि बम और पिस्तौल से क्रांति नहीं आती, क्रांति विचारों की धार से आती है और वह धार सिर्फ किताबों से मिलती है।
हमारे संविधान के निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के पास 50,000 किताबों की निजी लाइब्रेरी थी। उन्होंने पढ़-लिखकर वह ज्ञान हासिल किया जिसने सदियों की सामाजिक गुलामी की जंजीरें काट दीं।
आज के युवाओं को अगर सच में देश के लिए कुछ करना है, तो उन्हें इस डिजिटल गुलामी की जंजीरों को तोड़ना होगा। टेक्नोलॉजी को अपना मालिक मत बनने दीजिए, उसे अपना गुलाम बनाइए। ज्ञान के उस रोमांच को महसूस करें जो किताबों के पन्नों में छुपा है।
चंद सेकंड की रील्स में तुम इतिहास नहीं बन पाओगे।
बनना है विवेकानंद, तो किताबों से दिल लगाओ तुम,
पन्नों को पलटे बिना, तुम देश को आगे नहीं बढ़ा पाओगे!”
आइए, आज 15 अगस्त के इस पावन अवसर पर, हम सब मिलकर एक महा-संकल्प लें। हम संकल्प लें कि हम स्क्रीन के इस आत्मघाती भटकाव को छोड़ेंगे और टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल करेंगे। हम हर दिन कम से कम कुछ पन्ने किसी अच्छी किताब के जरूर पढ़ेंगे। हम खुद भी ‘रीडर’ बनेंगे और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी विचारवान बनाएंगे। क्योंकि जब देश का युवा गहराई से पढ़ेगा, वैचारिक रूप से आज़ाद होगा, तभी हमारा भारत सच्चा स्वतंत्र भारत बनेगा और फिर से विश्वगुरु कहलाएगा!
खुद पढ़ें और किसी दूसरे को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करें।
इसी वैचारिक आज़ादी के संकल्प के साथ, युवाओं को जगाने और आगे बढ़ाने के इस सफर का नाम है—Read N Rise with Madhukar Mokha.
हमारी पहचान तो बस इतनी है कि हम हिन्दुस्तानी हैं।
पढ़ेंगे, बढ़ेंगे और रचेंगे इतिहास नया हम,
कि इस देश के युवाओं में विवेकानंद की रवानी है!”
भारत माता की जय!
जय हिन्द! जय भारत!
आपका,
मधुकर मोखा
संस्थापक — Read N Rise
15 अगस्त 2026